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जहां कभी लगती थी नक्सलियों की जन अदालत,वहां अब प्रशासन की पहुंच,बंदूक की आवाज नहीं अब किताबों के ज्ञान से गूंजेगा इलाका

कांकेर। आज से दो साल पहले तक जो इलाका नक्सलियों की राजधानी के नाम से जाना जाता था अब वहां शांति और सुकून है,अब इस इलाके में बंदूक की नहीं बल्कि किताबों के ज्ञान से विकास की गाथा लिखी जाएगी। जिला प्रशासन ने दो साल पहले तक बेहद संवेदनशील माने जाने वाले सितरम गांव पहुंचकर बस्तर मुन्ने शिविर का आयोजन किया।इस दौरान कांकेर जिले के कलेक्टर नीलेश क्षीरसागर समेत जिला प्रशासन में कई अधिकारी भी सितरम गांव पहुंचे और ग्रामीणों की समस्याएं सुनी और जल्द निराकारण का वादा भी किया है। कलेक्टर नीलेश क्षीरसागर ने बच्चों को किताबें भी बांटी और उनके भविष्य के लिए शुभकामनाएं दी। 

एक समय ऐसा था जब पखांजूर के सितरमगांव नक्सल गतिविधियों और जन अदालतों के लिए जाना जाता था,जिस जगह कभी नक्सलियों की बैठक और जन अदालतों का भय लोगों के मन में बना रहता था, वहीं अब प्रशासन द्वारा बस्तर मुन्ने कार्यक्रम के तहत जनसमस्याओं के निराकरण के लिए शिविर लगाया गया है यह बदलते बस्तर और विकास की ओर बढ़ते ग्रामीण क्षेत्रों की एक नई तस्वीर बनकर सामने आया है।बस्तर मुन्ने के अंतर्गत आयोजित इस शिविर में पहली बार कांकेर जिले के कलेक्टर सितरम गांव पहुंचे, उनके साथ विभिन्न विभागों के अधिकारी और कर्मचारी भी मौजूद रहे, प्रशासन की टीम ने ग्रामीणों से सीधे संवाद कर उनकी समस्याएं सुनीं और कई मामलों का मौके पर ही निराकरण किया।इसके साथ जिन हाथों में कभी माओवादियों द्वारा बंदूक थमाया जाता था उन नन्हे बच्चों के हाथों में पहली बार किसी कलेक्टर ने पुस्तके दे कर उनको शिक्षा की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया।

सरपंच मैनी कचलामी ने बताया कि पहले इस क्षेत्र में भय और असुरक्षा का माहौल बना रहता था। मुख्यालय से कोसों दूर होने और नक्सली प्रभाव के कारण प्रशासनिक अधिकारी यहां आने से कतराते थे। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। प्रशासन गांव तक पहुंचकर लोगों की समस्याएं सुन रहा है, जिससे ग्रामीणों में विश्वास बढ़ा है।

सितरम में आयोजित यह शिविर केवल प्रशासनिक कार्यक्रम नहीं रहा, बल्कि यह उस बदलते दौर का प्रतीक बन गया, जहां कभी बंदूक और भय का माहौल था, वहां अब विकास और संवाद की नई शुरुआत दिखाई दे रही है।

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