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1984 में कांकेर में पनपा नक्सलवाद, 42 साल बाद हुआ अंत, शुरूआत से अंत तक की पूरी कहानी पढ़िए 

गौरव श्रीवास्तव 

कांकेर। नक्सलवाद एक ऐसा दंश जिसने देश भर में कई परिवारों को उजाड़ दिया साथ ही कई इलाकों में सालों तक विकास का सबसे बड़ा बाधक बना रहा , छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग ने नक्सलवाद का सबसे अधिक दंश झेला है, उत्तर बस्तर कांकेर में नक्सलवाद की शुरूआत से लेकर अंत तक की वो कहानी जिसने सैकड़ों घरों को उजाड़ दिया,साथ ही इस नक्सलवाद के कारण ही आज भी जिले के कई इलाके 90 के दशक की तरह प्रतीत होते है आज भी इन क्षेत्रों में विकास के नाम पर कुछ नहीं है। ना सड़के ना पीने का साफ पानी ना ही मूलभूत सुविधा, इस नक्सलवाद ने कैसे कांकेर में पैर पसारे और आखिर कैसे इसका अंत हुआ इस खबर के माध्यम से आप समझ सकते हैं। 

1984 में नक्सलवाद की शुरुवात,इरपानार में पहली घटना 

20 दिसम्बर 1984 की वो रात जिस दिन कांकेर के लोगों ने नक्सलवाद का नाम सुना और इसकी दहशत फैलने लगी, पखांजूर थाना क्षेत्र के बांदे चौकी के इरपानार गांव में 8 से 10 हथियारबंद लोग घुसे और कई घरों में डकैती की घटना को अंजाम दिया, बताया गया कि ये लोग महाराष्ट्र के रास्ते घुसे थे, जब ग्रामीणों ने बांदे चौकी में डकैती की शिकायत दर्ज करवाई तब पुलिस ने जांच शुरू की तब जो बात सामने आई उसने पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया, महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में सक्रिय नक्सलियों की एटापल्ली एरिया कमेटी ने इस घटना को अंजाम दिया था, यही वो दिन था जब उत्तर बस्तर में नक्सलवाद की शुरुवात हुई, इसके बाद नक्सलियों ने इस क्षेत्र को अपना ठिकाना बना लिया क्योंकि घने जंगल, नदी और सुनसान इलाका नक्सलियों के लिए सेफ जोन था और यही से कांकेर में नक्सलवाद शुरू हुआ। 

1998 में पहला नक्सल हमला, जिसमें जवान हुआ शहीद 

 11 सितंबर 1998 का दिन था कांकेर कुछ माह पहले ही नया जिला बना था पुलिस के बड़े अधिकारी अब कांकेर में बैठने लगे थे, नक्सलवाद इस दौरान अपने चरम पर था, कोयलीबेडा थाना में तैनात प्रधान आरक्षक राजेश पांडे थाना से कुछ दूरी पर अपने घर पर थे, राजेश पांडे तेज तर्रार पुलिस वाले थे और क्षेत्र में अपनी पकड़ बनाने की कोशिश कर रहे नक्सलियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती थे, इसलिए नक्सलियों ने उन्हें निशाना बनाया और उनके घर में हमला कर दिया, राजेश पांडे ने नक्सलियों से डटकर मुकाबला किया लेकिन गंभीर रूप से घायल हो गए और कुछ देर बाद उनकी मौत हो गई, वो उत्तर बस्तर कांकेर के पहले शहीद जवान है, इसके बाद अब तक नक्सल घटनाओं में कांकेर के 92 जवानों ने अपनी शहादत दी है ,तब कही जाकर आज हम नक्सलवाद से मुक्त होने के कगार पर खड़े है। 

नक्सलियों ने हमले का नया तरीका, आईईडी ब्लास्ट से फैली दहशत 

नक्सलवाद की शुरुवात के बाद 1990 में यह बात सामने आई थी कि नक्सलवाद का श्री लंका के प्रतिबंधित संगठन लिट्टे से नाता है, यह बात तब साबित भी हो गई जब लिट्टे के हमले के तरीके को नक्सलियों ने अपनाया , 25 मार्च सन 2000 में कोयलीबेड़ा से जवानों की पार्टी गश्त पर थी, तभी थाने से करीब 4 किलोमीटर दूर सुलंगी और गावड़ेगांव जाने वाले मार्ग में नक्सलियों ने बारूदी सुरंग विस्फोट किया, जिसमें 2 जवान घायल हो गए थे, नक्सलियों के हमले के इस नए तरीके से क्षेत्र में तो दहशत फैली ही लेकिन पुलिस के जवानों में भी हड़कंप मच गया था इसके बाद जवान काफी सतर्क रहने लगे और सावधानी से आना जाना करते थे उस दौर में आईईडी डिटेक्टर जैसी मशीन भी पुलिस के पास नहीं हुआ करती थी, हालांकि इसके बाद सुविधाएं बढ़ी लेकिन उसके बाद भी सैकड़ों जवानों ने बस्तर में आईईडी ब्लास्ट में शहीद हुए, नक्सलियों का जवानों पर हमला करने का यह सबसे सटीक तरीका था, आज जब नक्सलवाद समाप्ति की ओर है तब भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बस्तर के जमीन में सैकड़ों आईईडी आज भी लगी हुई है। जिन्हें ढूंढकर डिफ्यूज करना पुलिस ने लिए अब भी चुनौती है। 

पहली बार पुलिस और नक्सलियों का आमना सामना, 

 7 अप्रैल 1999 का दिन था रावघाट क्षेत्र के तालबेड़ा के पास नक्सलियों की मौजूदगी की सूचना थी, जवानों को रवाना किया गया, तभी जवानों का नक्सलियों से सामना हो गया, दोनों तरफ से गोलीबारी हुई, यह उत्तर बस्तर की पहली मुठभेड़ थी, हालांकि इस मुठभेड़ में कोई हताहत नहीं हुआ था , लेकिन यह उत्तर बस्तर में वर्षों तक चलने वाले एक अघोषित युद्ध की शुरुवात थी, जो आज इस मुठभेड़ के 27 साल बाद आज समाप्ति की ओर है। लेकिन इन मुठभेड़ों में बस्तर समेत पूरे देश ने अपने कई जवानों को खोया है। 

जब पुलिस मुखबिर के नाम पर शुरू हुई ग्रामीणों की हत्या, 277 ग्रामीण मारे गए 

जब नक्सलवाद हावी हो रहा था तब पुलिस को इनकी सूचना समय पर नहीं मिलती थी, नक्सली क्षेत्र में हिंसा का खेल खेल रहे थे, तब कुछ समझदार और निडर युवा पुलिस की मदद करने आगे  आए, लेकिन नक्सलियों को इस बात की भनक लग गई कि कुछ लोग पुलिस की मदद कर रहे है, फिर नक्सलियों ने अपना सबसे क्रूर चेहरा दिखाया, नक्सलियों ने पहली बार जन अदालत लगाई और ग्रामीणों को इकट्ठा होने का फरमान जारी किया ,खगेंद्र मंडल नाम के 28 साल के युवा को  पुलिस मुखबिरी के शक में नक्सलियों ने जन अदालत में मौत की सजा सुनाई और बेरहमी से हत्या कर दी, जिसके बाद क्षेत्र में भारी दहशत फैल गई, यह घटना बांदे चौकी के पी व्ही 93 में हुई थी। इसके बाद नक्सलियों ने अब तक कुल 277 ग्रामीणों की हत्या की है, जिन पर पुलिस मुखबिरी और नक्सलवाद के विरोध के आरोप नक्सलियों ने लगाए थे। 

40 साल मचाया आतंक फिर कैसे शुरू की खात्मे का काउंडाउन 

नक्सलियों की दहशत 2024 के पहले तक इतनी थी कि कई इलाकों में फोर्स तक को नहीं भेजा जाता था, कांकेर में कई ऐसी घटनाएं हुई जिसमें जवानों की शहादत हुई, 2009 में  कांकेर धमतरी बॉर्डर पर 12 जवान, 2007 में  दुर्गकोंडल नक्सल हमले में 7 जवान, महला कैंप के पास नक्सल एंबुश में 4 जवान की शहादत हुई,इसके अलावा कई ऐसी घटनाएं है जिसमें हमने जवानों को खोया और कई घर उजड़े, लेकिन आखिरकार इस आतंक का अंत का समय आय और 16 अप्रैल 2024 को छोटे बेतिया थानाक्षेत्र के कल्पर और हापाटोला में बड़ी संख्या में नक्सलियों की मौजूदगी की खबर आई, फिर एक बड़ी जवानों की एक बड़ी टीम कोटरी नदी पार कर नक्सलियों की राजधानी कहे जाने वाले माड़ इलाके में घुस गई, जहां खूंखार नक्सलियों से जवानों का सामना हुआ, जवानों ने एक एक कर 29 नक्सलियों को मार गिराया, यह पहला मौका था जब पूरे छत्तीसगढ़ में इतनी बड़ी संख्या में नक्सली मारे गए थे, इसके बाद ही नक्सलियों का  काउंडाउन बस्तर में शुरू हुआ और लगातार बड़ी मुठभेड़ों में मारे गए नक्सलियों की संख्या कभी 31 , कभी 38 तो कभी 30 हुई, इसके बाद नक्सलियों में फोर्स की दहशत फैली और बड़े बड़े नक्सली कैडर जंगल छोड़कर मुख्य धारा में लौटने लगे। 

कांकेर में आतंक का पर्याय रहे नक्सलियों के ये लीडर 

कांकेर में सालों तक नक्सलवाद की नींव रखने वाले बड़े नक्सलियों में रामढेर सबसे बड़ा चेहरा था जिसे नक्सलियों ने बाद में सीसी मेंबर भी बना दिया था इसने आखिर में आत्म समर्पण किया,, इसके अलावा राजू सलाम सबसे बड़ा नाम था,जो कि स्थानीय था और क्षेत्र के जंगलों की उसको अच्छी समझ थी, पुलिस पर हमला करना जंगलों में गायब हो जाना इसमें वो माहिर था, राजू ने भी आत्म समर्पण कर दिया है,  इसके साथ ही शंकर राव जो कि कल्पर मुठभेड़ में 2024 में मारा गया , विजय रेड्डी यह भी मोहला मुठभेड़ में मारा गया, दर्शन पद्मा एक बड़ा खूंखार नाम था जिसे पुलिस ने 2021 में मार गिराया था। ये सभी वो चेहरे थे जिन्होंने कांकेर में नक्सलवाद के नाम पर खूब आतंक मचाया था। 

शहीद परिवार बोले हमारा तो सब कुछ उजड़ गया ,खुशी है अब किसी का घर नहीं उजड़ेगा 

नक्सलवाद के खात्मे को लेकर शहीद परिवार ने भी खुशी जाहिर की, शहीद सब इंस्पेक्टर बीएस नेताम की पत्नी धीरज नेताम बताती है कि 20 फरवरी सन 2000 में उनके पति नारायणपुर में पदस्थ थे तभी एक गांव में नक्सलियों के द्वारा ग्रामीणों को बुरी तरह मारने की खबर आई, तत्काल वो अपनी टीम के साथ उस गांव में जाने के लिए रवाना हुए थे लेकिन कुछ देर बाद उनके शहादत की खबर आई, नक्सलियों ने आईईडी ब्लास्ट कर गाड़ी उड़ा दी थी, जिसमें 23 जवान शहीद हुए थे, उन्होंने बताया इस घटना के बाद पूरी जिंदगी बदल गई, 4 बच्चों की जिम्मेदारी अब अकेले उन पर थी, आज इस घटना को 26 साल हो चुके है लेकिन दर्द अभी तक जिंदा है, उन्होंने कहा कि नक्सलवाद खत्म हो रहा है यह सुनकर दिल में सुकून है, अब किसी और का घर नहीं उजड़ेगा , किसी बेटे के सिर से उसके पिता का साया नहीं हटेगा कोई पत्नी विधवा नहीं होगी किसी मां का बेटा नहीं उसे छोड़कर नहीं जाएगा। 

शहीद सब इंस्पेक्टर शिवलोचन साहू की पत्नी कलावती साहू  बताती है कि 2007 में नक्सलियों से मुठभेड़ में उनके पति शहीद हो गए थे, उसके बाद से आज तक घर में कोई त्यौहार मन से नहीं मनता, होली दीवाली में जब दूसरों को धूमधाम से एक साथ त्यौहार मनाते देखते है तब अपने पति की याद आती है कि वो होते तो आज उनका परिवार भी खुशियों से त्यौहार मनाता, उन्होंने कहा कि कई परिवार नक्सलियों के कारण उजड़े है, अच्छा है इसका खात्मा हो रहा है, अब क्षेत्र के लोग शांति से रह सकेंगे, किसी के घर में बेसमय मातम नहीं होगा।

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