Authored by: Gaurav Shrivastava
विजेंद्र पांडेय
कांकेर।कहते हैं बच्चे देश का भविष्य होते हैं, लेकिन जब यही भविष्य झोपड़ी में बैठकर शिक्षा लेने को मजबूर हो जाए, तो विकास और शिक्षा के तमाम दावों पर सवाल खड़े होना लाज़िमी है।
कांकेर जिले के अंतागढ़ विकासखंड से सामने आई यह तस्वीर सिर्फ एक स्कूल की बदहाली नहीं, बल्कि व्यवस्था की उस हकीकत को बयां करती है जिसे अक्सर आंकड़ों और सरकारी दावों के पीछे छिपा दिया जाता है। प्रदेश में नए शिक्षा सत्र की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन मडपा गांव के मासूम बच्चे आज भी अच्छे स्कूल भवन का इंतजार कर रहे हैं।

अंतागढ़ विकासखंड की ग्राम पंचायत तालाबेड़ा के आश्रित ग्राम मडपा में स्थित प्राथमिक शाला और माध्यमिक शाला का भवन पिछले कई वर्षों से जर्जर अवस्था में पड़ा हुआ है। भवन की हालत इतनी खराब हो चुकी है कि वहां बच्चों को बैठाकर पढ़ाना खतरे से खाली नहीं है।
पिछले वर्ष बारिश के दौरान जब बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह प्रभावित होने लगी, तब गांव के ग्रामीणों ने खुद आगे आकर अपने पैसे और श्रम से एक अस्थायी झोपड़ी का निर्माण कराया था, ताकि बच्चों की शिक्षा बाधित न हो। प्रशासनिक मदद का इंतजार करते-करते थक चुके ग्रामीणों ने खुद जिम्मेदारी उठाई और बच्चों के लिए पढ़ाई की व्यवस्था की।
विडंबना देखिए कि एक साल बाद भी हालात नहीं बदले। जिस झोपड़ी को अस्थायी व्यवस्था के तौर पर बनाया गया था, आज भी वही बच्चों का स्कूल बनी हुई है।
अब एक बार फिर बारिश का मौसम शुरू होने को है। झोपड़ी की मजबूती, बच्चों की सुरक्षा और पढ़ाई को लेकर अभिभावकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। दूसरी ओर जर्जर स्कूल भवन अब भी मरम्मत या नए निर्माण की बाट जोह रहा है।
ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार प्रशासन और शिक्षा विभाग को आवेदन देकर नए भवन की मांग की, लेकिन अब तक कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ग्रामीणों को बच्चों की पढ़ाई बचाने के लिए अपनी जेब से झोपड़ी बनानी पड़े, तब व्यवस्था की जिम्मेदारी आखिर कहां नजर आती है?
मडपा की यह तस्वीर सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं है। मानसून के दौरान प्रदेश के दूरस्थ और अंदरूनी इलाकों से ऐसी न जाने कितनी तस्वीरें सामने आ सकती हैं, जहां बच्चे जर्जर भवनों, टपकती छतों और अस्थायी व्यवस्थाओं के बीच शिक्षा हासिल करने को मजबूर होंगे। ये तस्वीरें बेहतर शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के तमाम दावों की हकीकत भी सामने लाएंगी।
फिलहाल ग्रामीणों की मांग है कि बच्चों की सुरक्षा और उनके भविष्य को देखते हुए मडपा गांव में जल्द से जल्द नए स्कूल भवन की स्वीकृति दी जाए। अब देखना होगा कि जिम्मेदार विभाग इन मासूम बच्चों की पुकार कब सुनता है और कब झोपड़ी में पढ़ने को मजबूर बच्चों को एक सुरक्षित स्कूल भवन की सौगात मिलती है।






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