विजेंद्र पांडेय
शिक्षा के लिए संघर्ष और जोखिम—यही है बदलता बस्तर।
बोड़ागांव पंचायत के आश्रित गांव जीवदंड से नीलझर माध्यमिक शाला तक बच्चों का सफर बना चिंता का विषय
अंतागढ़। तस्वीरें और वीडियो कई बार वह सच सामने ला देते हैं, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल होता है। बोड़ागांव पंचायत के आश्रित गांव जीवदंड से लगभग 6 से 7 बच्चे नीलझर माध्यमिक शाला में पढ़ने के लिए रोजाना जिस रास्ते से गुजरते हैं, उसका वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। नदी पार करने के बाद आगे एक नाले पर लकड़िया रखी गई है, जिससे पार होकर इन मासूमों को स्कूल जाना होता है, एक छोटी सी चूक और किसी भी वक्त बड़ा हादसे का डर बना रहता है,
वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि इन बच्चों के सामने स्कूल तक पहुंचने का रास्ता कितना चुनौतीपूर्ण है। नदी-नालों को पार करते हुए, दुर्गम रास्तों से गुजरते ये बच्चे अपने कंधों पर सिर्फ स्कूल बैग नहीं, बल्कि बेहतर शिक्षा और बेहतर भविष्य का सपना लेकर निकलते हैं।
जहां कई बच्चों के लिए स्कूल तक पहुंचना एक सामान्य दिनचर्या है, वहीं जीवदंड के इन मासूम बच्चों के लिए यह सफर किसी चुनौती से कम नहीं। रास्ते की कठिनाइयां उनके कदमों को रोक नहीं पातीं। शिक्षा पाने की चाहत उन्हें हर दिन आगे बढ़ने का हौसला देती है।
लेकिन यह वीडियो सिर्फ बच्चों के हौसले की कहानी नहीं है। यह उन व्यवस्थागत कमियों पर भी सवाल खड़ा करता है, जिनके कारण आज भी बच्चों को शिक्षा के लिए जोखिम भरे रास्तों से गुजरना पड़ रहा है।
एक तरफ बस्तर को विकास और बदलाव की नई तस्वीर के रूप में देखा जा रहा है, तो दूसरी तरफ इन बच्चों का संघर्ष हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या विकास की रोशनी इन दूरस्थ गांवों तक पूरी तरह पहुंच पाई है?
इन बच्चों के छोटे-छोटे कदम शायद सिस्टम के लिए एक बड़ा सवाल हैं—
क्या अच्छी शिक्षा पाने का सपना देखने वाले इन बच्चों को सुरक्षित रास्ता देना व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं है?
जीवदंड के इन बच्चों का जुनून बताता है कि बस्तर बदल रहा है, लेकिन बदलाव की असली तस्वीर तब पूरी होगी, जब शिक्षा के लिए बच्चों को जोखिम नहीं, सुरक्षित रास्ता मिलेगा।





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